Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 27–28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verses 27–28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 27,28
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
भगवन्सर्वधर्मज्ञ भार्गवेण तदा किल ।
सुबहून्युपभुक्तानि शरीराणि पुनःपुनः ॥ २७ ॥
भृगुणोत्पादिते काये तत्तस्मिंस्तस्य किं पुनः ।
महानतिशयो जातः परिदेवनमेव वा ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, आप सम्पूर्ण धर्मौ के तत्त्वों को जाननेवाले हैं, कृपया यह
बतलाइये कि शुक्राचार्यजी ने उस समय बारबार अनेक शरीरों का उपभोग किया था जैसा कि आप
पहले कह आये हैं, फिर उन्हें भृगु से उत्पादित उसी शरीर में अत्यन्त स्नेह कैसे हुआ ? और उसीके
लिए उन्होने विलाप क्यों किया ?