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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verses 30–31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verses 30–31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 30,31

संस्कृत श्लोक

सा हीदंप्रथमत्वेन समुपेत्य परात्पदात् । भूताकाशपदं प्राप्य वातव्यावलिता सती ॥ ३० ॥ प्राणापानप्रवाहेण प्रविश्य हृदयं भृगोः । क्रमेण वीर्यतामेत्य संपन्नौशनसी तनुः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रलयकाल में अवशिष्ट मायाशबलित ईश्वर से इस कल्प के सर्वप्रथम शरीररूप से जल में भिगोने से फूले हुए बीजों के अन्दर अंकुर शक्ति की नाई तनिक आविर्भूत होकर, क्रमशः तत्‌ तत्‌ भूतो की समता को प्राप्त होकर वायु से वृष्टि द्वारा अन्न आदि भाव से अन्तर्भावित हुई वही कर्मात्मिक वासना प्राण ओर अपान के प्रवाह से महर्षि भृगु के हृदय में प्रवेश कर क्रम से वीर्य बनकर शुक्राचार्य की देह बनी हे