Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
इदंप्रथममायाता यदासौ ब्रह्मणस्तनुः ।
अतस्तां प्रति शुक्रेण तदा तत्परिदेवितम् ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
चूँकि यह शरीर ब्रह्म से पूर्वोक्त रीति के अनुसार पहले-पहल इसी शुक्राचार्य के रूप में
(=) जैसे परमानन्द में स्थित पुरुष, हाथी, मेघ, सिंह, आदि के शरीर को नहीं देखता है वैसे
ही चित्तरूप अनर्थ से मुक्त हुआ मेरा यह शरीर पर्वत की स्फटिक शिलाओं में प्रतिबिम्बित हाथी,
मेघ और सिंहो की मूर्ति को नहीं देखता है, ऐसा दूसरा अर्थ भी हो सकता है ।
आविर्भूत हुआ था, इसलिए शुक्राचार्य ने इस शरीर के लिए विलाप किया