Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 15, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 15, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 15 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
सूर्यस्य प्रतिबिम्बानि क्षुभ्यन्ति न पुनः स्थिरम् ।
चलाचलतया तज्ज्ञो लोकवृत्तिषु तिष्ठति ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
एक ही पुरुष का एक समय स्थिर ओर अस्थिर वृत्तियों के विरोध का निवारण करने के लिए
दृष्टान्त देते हैं।
जैसे सूर्य के जल में पड़े हुए प्रतिबिम्ब शरीर ही चंचल होते हैँ, किन्तु आकाश में स्थित बिम्बशरीर
चंचल नहीं होता, वैसे ही आत्मज्ञान में स्थिर तत्त्वज्ञानी भी लोकव्यवहारो में स्थिर-अस्थिर रूप से
विद्यमान रहता है