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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

बीजस्याङ्कुरपत्रादि स्वं चमत्कुरुते यथा । सर्वेषां भूतसङ्घानां भ्रमखण्डास्तथैव हि ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बीज के भीतर स्थित अंकुर, पत्ते आदि अपने स्वरूपको प्रकट करते हैं यानी चमत्कार को प्राप्त होते हैं, वैसे ही सब प्राणियों के भ्रान्ति से उत्पन्न द्वैतभेद अपने को प्रकट करते हैं