Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 17, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 17, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 17 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
यथा संप्रतिभासस्थः स्वयं संसारखण्डकः ।
तथा तेषां सहस्राणि मिथ्या दृष्टानि सन्ति हि ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि प्रत्येक जीव के संसार प्रत्येक मे अलग अलग उदित हुए हैं, तो वे प्रतीत क्यो नहीं होते, इस
पर प्रतीत होते ही हैं, ऐसा कहते हैं।
जैसे हमारे स्फुट अनुभव में स्थित हमारा मिथ्या संसार है, वैसे ही अन्य जीवों के मिथ्या हजारों
संसार हैं ही