Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
यथा शुद्धः प्राणमरुत्परप्राणादिवेदनात् ।
वेत्ति वेद्यं मनोराज्यं तथा सर्गान्तराश्रयम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार कहीं पर अशुद्धों के भी परस्पर सम्बन्धकी उपपत्ति बतलाकर शुद्धों के अन्य के मनोराज्य
के परिज्ञान में दृष्टान्त कहते हैं।
जैसे हठयोग के अभ्यास से शुद्ध हुआ प्राणवायु दूसरे के शरीर में प्रवेश द्वारा दूसरे के प्राणों और
देहेन्द्रियों में अपनी स्वाधीनता के परिज्ञानवश उनसे ज्ञेय शब्द आदि विषयों को जानता है, वैसे ही शुद्ध
मन भी अन्य सृष्टि के मनोराज्य को जानता है