Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verse 41
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verse 41 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 41
संस्कृत श्लोक
स्वादयत्येवमेषा चित्पृथक्पश्यति संस्थितिम् ।
या योदेति यथा यस्या जीवशक्तेः स्वसंसृतिः ॥ ४१ ॥
हिन्दी अर्थ
चमत्कृति की विचित्रता में चमत्कृति की कल्पना करनेवाले तत्-तत् जीवों के विचित्र संस्कार का
उद्बोध ही कारण है ऐसा कहते हैं।
इस जीवशक्ति को जो-जो अपनी सृष्टि जैसे उदित होती है, वह आत्मचिद्रूप उस-उस भुवन
स्थिति को वैसे ही प्राप्त होती है