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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 18, Verses 61–63

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 18, verses 61–63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 18 · श्लोक 61,62

संस्कृत श्लोक

जीवान्तः प्रतिभासस्य सर्वस्य पुनरन्तरे । जीवखण्ड उदेत्युच्चैस्तस्यान्तरितरोऽपि च ॥ ६१ ॥ जीवान्तर्जायते जीवस्तस्यान्तरपि जीवकः । सर्वत्र रम्भादलवज्जीवो जीवान्तरेव हि ॥ ६२ ॥ दृश्यबुद्धिपरावृत्तौ सममेतदनन्तरम् । हेम्नीव कटकादित्वं परिज्ञातं विनश्यति ॥ ६३ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव के अन्दर दूसरे जीव का, दूसरे जीव के अन्दर फिर दूसरे जीव का, फिर दूसरे जीव का यों अव्यवस्थित, सप्रपंच जीव के उदय में भी उसमें स्थित चैतन्य में अज्ञानसहित तत्‌-तत्‌ सत्ता ही हेतु है। उसका ज्ञान होने पर कुछ भी कहीं पर न अवशिष्ट था, न है और न रहेगा, इस आशय से कहते हैं। जीव के अन्तर्वर्ती सम्पूर्ण प्रतिभास के अन्दर जीवसमूह का उदय होता है, उसके अन्दर पुन: दूसरा जीवसमूह उदित होता है, उसके अन्दर फिर दूसरा जीव, जीव के अन्दर फिर जीव, उसके अन्दर भी जीव उत्पन्न होता है केले के पत्तों की तरह जीव के अन्दर सर्वत्र जीव ही है