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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

तस्मिन्प्रसर्पत्यङ्गेषु सर्वा संविदुदेति हि । दृष्टत्वात्प्रैति चित्ताख्यमन्तर्लीनजगद्भ्रमम् ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जीव चेतन के भीतर सब नाड़ियों मेँ संचार करने पर सब संवित्‌ (ज्ञान) उदित होती है । पहले अनुभूत होने के कारण संवित्‌ जिसमें जगतरूप भ्रम अन्दर छिपा हो, ऐसे चित्त को प्राप्त होती है यानी उनमें वासनाओं की उत्पत्ति होने के कारण स्वप्न देखती हे