Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 19, Verse 2

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 19, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 19 · श्लोक 2

संस्कृत श्लोक

चिद्धनैकघनात्मत्वाज्जीवान्तर्जीवजातयः । कदलीदलवत्सन्ति कीटा इव धरोदरे ॥ २ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे केले के पत्ते एक के भीतर एक रहते हैं और ओर जैसे धरातल के गर्भ में नाना प्रकार के कीड़े रहते हँ, वैसे ही आनन्दघन, एक अवकाशरहित आत्मस्वरूप होने के कारण जीव के भीतर भी अनेक जीवजातिर्यौ रहती हैँ । एक के भीतर एक उसके भी भीतर एक इस परम्परा की कल्पना में दृष्टान्त केले के पत्ते दिये हैँ । एक के भीतर अनेक की स्थिति कल्पना में दृष्टान्त धरातल के कीड़े दिये गये हैं