Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 20, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 20, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 20 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
भावाभावग्रहोत्सर्गदृशश्चेतनकल्पिताः ।
नासत्या नापि सत्यास्ता मनश्चापलकारिताः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे सत् ओर असतूरूप हेय ओर उपादेय प्रतीति के विषय सभी पदार्थ एकमात्र मन से कल्पित
होने के कारण सत् ओर असत् से विलक्षण (अनिर्वचनीय) है, यह सिद्ध हुआ, ऐसा कहते है।
भाव, अभाव, उपादान, त्याग आदि प्रतीतिर्यौ चेतन में कल्पित हँ । न तो सत्य हैं और न असत्य
है । मन की चपलता ही इनकी जननी हे