Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 21, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 21, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 21 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
कर्मेन्द्रियगणे क्षुब्धे स्वशक्तिं प्रणयत्यलम् ।
कर्म निष्पद्यते स्फारं पांसुजालमिवानिले ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
क्षुब्ध हुए कर्मेन्द्रिय के
अपनी क्रियाशक्ति को प्रकट करने पर वायु मे धूलि समूह की तरह प्रचुर कर्म की निष्पत्ति होती है