Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 29, Verses 31–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 29, verses 31–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 29 · श्लोक 31-33
संस्कृत श्लोक
सायुधा बलमायेषुच्छिन्नकङ्कटहेतयः ।
दूरापातविपर्यस्तपतन्नानायुधांशुकाः ॥ ३१ ॥
कण्ठलम्बिशिरस्त्राणचटत्कारोग्रभीतयः ।
शिखाशतशिलाप्रोता देहभागविलम्बिनः ॥ ३२ ॥
शाल्मल्युग्रदृढापातकटत्कण्टकसंकटाः ।
सुशिलाफलकास्फालशतधाशीर्णमस्तकाः ॥ ३३ ॥
सर्वं एव सकलायुधशस्त्रपातमात्रसमनन्तरमेव ।
दिक्षु नाशमगमन्नसुरेन्द्राः पांसवोऽम्बुदनिधौ पयसीव ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
वे लोग आयुधो से युक्त थे,
सेनाओं ने माया द्वारा ओर बाणो द्वारा उनके कवच ओर आयुध नष्ट -भ्रष्ट कर दिये थे, दूर भागने से
अस्त-व्यस्त हुए एक प्रकार के उनके अस्त्र ओर वस्त्रों की श्रेणियाँ गिर रही थी, गले में लटके हुए
शिरस्त्राणं के चटचट शब्द से उन्हे बड़ा भय हो रहा था, सैकड़ों शिखाओं से, जिनके अग्रभाग में गदि
थी, वे पर्वत की चोटियों की शिलाओं में गुंथे गये थे, अतएव उनके शरीर लटक रहे थे, कोटिदार सेमल
के पेड़ों में जोर से गिरने पर चुभ रहे काँटों से वे बड़े संकटाकीर्ण हो गये थे, बड़ी-बड़ी शिलारूपी
फलकं मेँ टकराने से उनके मस्तक के सैकड़ों टुकड़े हो गये थे ॥