Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 3, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
भाति संवित्प्रभैवेयमनाद्यन्तावभासिनी ।
यत्तदेतज्जगदिति स्वयंभूरिति च स्थितम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त अर्थ को ही स्पष्ट कहते हैं।
जो यह जगतरूप से और स्वयंभूरूप से (उत्पत्ति के पहले पृथक्सत्ता से माने गये पदार्थरूप से)
स्थित है, वह अनादि, अनन्त प्रकाशमान यह चेतन की प्रभा ही भासित होती है