Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 3, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 3, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 3 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
परमाणाविदं भाति त्रिजगत्सवनाभ्रखम् ।
देशकालक्रियाद्रव्यदिनरात्रिक्रमान्वितम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत का स्वभाव अव्यवस्थित है, इसलिए भी जगत की सत्ता जगद्रूप से नहीं है, किन्तु ब्रह्मरूपसे
ही है, इस आशय से जगत के अव्यवस्थित स्वभाव का उपपादन करते हैं।
जंगल, मेघ, आकाश आदि पदार्थों के सहित तथा देश, काल, क्रिया, द्रव्य, दिन और रात्रि के क्रम
से युक्त ये तीनों जगत परमाणु में भासित होते हैं