Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 31, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 31, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 31 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
एवमेतन्महाबाहो नासत्संभवति क्वचित् ।
कदाचित्किंचिदप्येव बृहत्संपद्यते तनु ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
अपने विशेष अभिप्राय को कहने के लिए श्रीवस्रिष्ठजी पहले श्रीरामचन्द्रजी की शंका का स्वीकार
कर उसका परिहार करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : महाबाहो, जैसा आप कहते हैं वैसा ही है। सत्य वस्तु कहीं कभी भी कुछ भी
असत् नहीं हो सकती, किन्तु सत् ही सूक्ष्म आविर्भाव से बृहत् होता है, वही उसकी उत्पत्ति है। बृहत्
तिरोभाव से सूक्ष्म हो जाता है, वही उसका विनाश है, यह भाव है