Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 32, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
मृगतृष्णाम्बुबुद्ध्येव याति जन्तुरिवान्तरम् ।
तरन्ति ते भवाम्भोधिं स्वप्रवाहधियैव ये ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब राजस अहंकार से चिदाकाश के देहादि के आकार का अभिमान प्रकार दिखाते है।
चिदाकाश भे" इस प्रकार रजोगुण से रंजित होता हे, रजोगुण से रंजित होकर वह अपने स्वाभाविक
स्वप्रकाशता का त्याग न करता हुआ ही अहंकार, प्राण, देह, इंद्रिय आदि को आत्मा समझता है ॥ ३ १॥
असत्य होती हुई भी सत्य की तरह प्रतीत हो रही अपनी ही वासना की भ्रान्ति से मृगतृष्णा में जलबुद्धि
के तुल्य जीव चिद्रूप से मानों भिन्नता को प्राप्त होता है ॥ ३ २॥
इस समय उस भेद से पार पाने का उपाय कहते है ।
जो लोग महावाक्यरूप शास्त्र से दृश्य "आगन्तुक हे" इस प्रकार निर्वाण में स्थित हैं, वे प्रत्यगात्मा
में उन्मुख बुद्धि से ही संसार सागर को पार करते हैं