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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 32, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

किमन्यद्भवभङ्गाय भूयो भोगेषु लुब्धता । यथाक्रमं यथाशास्त्रं यथाचारं यथास्थिति ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने अधिकार के अनुसार, उक्त अधिकारी की चित्तशुद्धि के अनुकूल शास्त्र के अनुसार ओर पहले-पहले के आचार्यो से प्रवर्तित सम्प्रदाय के अनुसार, एक-एक भूमिका में जब तक भूमिका का परिपाक न हो तब तक स्थिति का त्याग न कर सब लोगो को रहना चाहिए । अवास्तविक भोग समूह का अपने हृदय से त्याग करना चाहिए