Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 32, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 32, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 32 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
इदं बिम्बमिदं बिम्बमिति सत्यं विचार्यताम् ।
धिया परप्रेरणया यातमापशवो यथा ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
विषयाकार
वृत्ति में प्रतिबिम्बत चिदाभासो का अन्तःकरण अवच्छिन्न चैतन्य बिम्ब है और अन्तःकरणरूप उपाधि
उपहित चिदाभास का तो शुद्ध ब्रह्म चैतन्य ही बिम्ब हे । प्रतिबिम्ब ओर उसकी उपाधि असत्य हैं, बिम्ब
तो सत्य है । अन्त-ःकरणरूप उपाधि के असत्य होने पर तदवच्छिन्न बिम्ब चैतन्य का और
तत्समानाधिकरण चिदाभास के बिम्बभूत ब्रह्म चैतन्य का भेद मिथ्या ही है । इस प्रकार अखण्ड
सत्यप्रत्यगभिन्न ब्रह्म चैतन्य ही अन्त में अवशिष्ट रहता है, ऐसा विचार करना चाहिये ।
शंका: साख्य, पातंजल, गौतम, बुद्ध, अर्हत् आदि अन्य वादी उक्त प्रतिविम्बता प्रक्रिया को नहीं
मानते, किन्तु अन्यथा-अन्यथा निरूपण करते हैं और उसी में लोगों को प्रेरित करते हैँ । उनकी प्रेरणा
भी क्या उपादेय है या नहीं ?
समाधान : दूसरे की प्रेरणारूप बुद्धि से पशुओं के समान मत चालिये । भाव यह है कि "यथा ह्ययं
ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैको5नुगच्छन्” (जैसे यह ज्योतिर्मय सूर्य स्वतः एक होता हुआ
भी घटादिभेद से भिन्न जलों मे अनुगमन कर रहा बहुत्व को प्राप्त होता है वैसे ही अद्वितीय यह आत्मा
भी उपाधियो में बहुत्व को प्राप्त होता है ।) इत्यादि स्वतन्त्र श्रुतिरूप प्रमाणों का अनुसरण करनेवाले
लोगों को औरों की प्रेरणा से पशुओं के समान अनुगमन उचित नहीं है