Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
सर्वातिशयसाफल्यात्सर्वं सर्वत्र सर्वदा ।
संभवत्येव तस्मात्त्वं शुभोद्योगं न संत्यज ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
बत्तीसवाँ सर्गे समाप्त
तैंतीसवाँ सर्ग
शुभ उद्यम, साधु और सत्शास्त्र के माहात्म्य का वर्णन तथा
अहंकार की बन्धकता और उसके त्याग से मुक्ति प्राप्ति का वर्णन
आगे कहे जानेवाले शुभ उद्यम आदि के अभ्यास द्वारा वृद्धि को प्राप्त होने पर फल की अवश्यम्भाविता
दिखाने के लिए साधारण न्याय दिखलाते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, सब साधनों का अतिशय अभ्यास सफल होता है, यह
नियम है । अतः लोकदृष्टि कृषि, सेवा आदि साधनों में तथा शास्त्रीय मोक्ष-साधन में अपने-अपने
अनुरूप फल अवश्य होता ही है, कदापि वे विफल नहीं जाते । इसलिए मोक्षलाभार्थी आप भी शुभ
उद्यम को कदापि न छोड़िये