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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

अशमः परमं ब्रह्म शमश्च परमं पदम् । यद्यप्येवं तथाप्येनं प्रथमं विद्धि शंकरम् ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे, सम्पूर्ण विषय के दुःखपूर्वक त्याग का भी अंगीकार करके वैराग्य से राग आदि दोष का शमन अवश्य सम्पादनीय होता, यदिप्राप्तहोनेवाला ब्रह्म शम के साथ ही पुरुषार्थहोता। ऐसा तो है नहीं, क्योकि शम भी सात्विक चित्वृत्ति का भेद ही है, अतः अद्वितीय ब्रह्म में उसका संभव नहीं हो सकता । एकमात्र सुखरूप ब्रह्म से अतिरिक्त सब कुछ दृश्य ही है, इसलिए शम परम पुरुषार्थ के अन्तर्गत भी नहीं आ सकता। इस शंका को आधा स्वीकार करके परिहार करते हुए शम की आवश्यकता दिखलाते हैं। ठीक है, यद्यपि शमरहित चिदात्मा ही परम ब्रह्म है, तथापि शम भी कारणसहित संसार की निवृत्तिरूप परम पुरुषार्थ है ही । यद्यपि इस प्रकार दोनों तुल्य हैं, यह प्राप्त हुआ, तथापि इस प्रशम को भूमानन्द ब्रह्मसुख देनेवाला जानिये । जिसमें सुख की अभिव्यक्ति नहीं होती, वह पुरुषार्थ नहीं हो सकता, इसलिए इसमें पुरुषार्थ की उपयोगिता अधिक हे