Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 33, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 33, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 33 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
शिष्टाहंकारवाञ्जन्तुर्भगवान्याति मुक्तताम् ।
लोकाहंकारवद्दोषवपुरस्मिन्निरूपणः ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
किससे फिर जन्तु मुक्त होता है ? इस पर कहते हैं।
अवशिष्ट पूर्वोक्त शुद्ध अहंकारो से युक्त होकर जो पुरुष ममता से उत्पन्न हुए राग आदि दोषों को
नष्ट करता हुआ इस सर्वात्मभावरूप अहंकार उसमें भी लोकप्रसिद्ध देहात्मभावरूप अहंकार की तरह
दुढ़ होकर हिरण्यगर्भ या ईश्वरमैं हूँ, इस भावना से युक्त होता है, वह देहाहंभाव से मुक्त हो जाता हे