Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
मनो जीवो नरं विद्धि तदेवाकारमागतम् ।
आत्मनात्मानमादत्ते स्वविकल्पात्मकल्पितम् ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
शरीर में जड़ता आदि को ही स्पष्टरूप से विशद करते हैं।
शरीर के टुकड़े-टुकड़े करने पर रुधिर आदि से अन्य कुछ भी नहीं है, जैसे कि केले के खम्भे को काटने
पर पल्लवों से बनी हुई छाल के अतिरिक्त और कुछ चीज नहीं रहती ।।२४॥ मन ही जीव है, वही जब
साकार हो जाता है, तब उसे नर जानिये। वह अपने विकल्पों से कल्पित अपने स्वरूप का अपने आप ग्रहण
करता है