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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 36–38

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verses 36–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 36-38

संस्कृत श्लोक

गन्धर्वनगराकारा मृगतृष्णा इवोत्थिता । द्विचन्द्रविभ्रमाभासा द्वैतैकत्वविवर्जिता ॥ ३६ ॥ सर्वैव ब्रह्मसत्तेयमित्येषा परमार्थता । परिस्फुरति निःसारः संसारोऽयमसन्मयः ॥ ३७ ॥ नानन्तोऽहं वराकोऽहमिति दुर्निश्चयोदितः । अनन्तोऽस्मीश्वरोऽस्मीति निश्चयेन विलीयते ॥ ३८ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि कोई कहे कि दुर्भिक्ष आदि देशोपद्रव से समाधि का भंग हो जाने पर फिर मलिनता की प्राप्ति होगी ? तो इस आशंका पर कहते हैं। जैसे विरत उद्योगशील चन्द्रमा पूर्ण होने की आशा को नहीं छोड़ता वैसे ही दरिद्रता आदि से पीड़ित उद्योगशील उत्तम पुरुष भी समाधि आदि चित्तप्रसन्‍नता की गति को कभी नहीं छोड़ता ॥ ३ ४॥ अथवा तत्त्वज्ञान से बाधित होने के कारण ही हजारों उपद्रवो के रहते भी कलुषिता की प्राप्ति नहीं होती, इस आशय से कहते हैं। न तो यहाँ बन्धन है, न मोक्ष है, न बन्धन का अभाव है और न बन्धनवत्ता है । यह माया इन्द्रजाल की लता की तरह मिथ्या ही उत्पन्न हुई है॥ ३ ५॥ गन्धर्वनगर के समान, मृगतृष्णा के तुल्य एवं द्विचन्द्र्रम के तुल्य यह माया उदित हुई है। यह सब द्वैत और एकत्वरहित ब्रह्मसत्ता ही है, इस प्रकार की जो प्रतीति है, वह परमार्थता है। मे असन्मय अतएव निःसार हूँ, मे अपरिच्छिन्न नहीं हूँ अतएव क्षुद्र हूँ, इस प्रकार के दूषित निश्चय से उत्पन्न हुआ यह संसार परिस्फुरित हो रहा है । मे अपरिच्छिन्न हूँ, अतएव सर्वशक्तिशाली हूँ, इस निश्चय से वह विलीन हो जाता है