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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verses 41–42

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verses 41–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 41

संस्कृत श्लोक

नैर्मल्यप्राप्तमरणमसक्तं सर्वदृष्टिषु । अमनस्त्वमिहापन्नं ब्रह्म पश्यति नान्यथा ॥ ४१ ॥ मनो निर्मलतां यातं शुभसंतानवारिभिः । ब्राह्मीं दृष्टिमुपादत्ते रागं शुक्लपटो यथा ॥ ४२ ॥

हिन्दी अर्थ

निर्मलता की अधिकता से जिसे स्वविनाशप्रायः प्राप्त हो गया है, अतएव अमनस्ता को प्राप्त, सम्पूर्ण द्वैतद्रष्टियों में आसक्तिरहित मन इस अधिकारी शरीर में ही ब्रह्म का दर्शन करता है, अन्यथा नहीं कर सकता है