Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 35, Verse 6
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 35, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 35 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
दोषान्प्रसवति स्फारान्वासनावलिता मतिः ।
कीर्णकण्टकबीजा भूः कण्टकप्रसरं यथा ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
भोगवासनाओं के रहने पर क्या हानि होती है ? ऐसा यदि कोई प्रश्न करे, तो उस पर कहते है।
जिस भूमि में कटि के बीज बिखरे हैं, वह भूमि जैसे काँटों को उत्पन्न करती है वैसे ही वासनाओं से
युक्त बुद्धि बड़े-बड़े राग आदि दोषों को उत्पन्न करती है