Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 36, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
अज्ञेष्वसत्स्वभावोग्रसंसारगणगर्भिणी ।
ज्ञेषु प्रकाशरूपैव सकलैकात्मिका सती ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी चिति को ज्ञानी ओर अज्ञानी की कल्पना से फिर विभाग करके कहते है।
अज्ञानियो मेँ यह चिति असत्स्वभाव भीषण जन्म-मरणरूप संसार परम्पराओं को अपने गर्भ में
धारण करनेवाली हे । ज्ञानियों की दृष्टि में तो सब की एक आत्मा होकर प्रकाशरूप ही है