Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verses 21–22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 36, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 21,22
संस्कृत श्लोक
व्योम सौषिर्यमादत्ते सर्वमूर्त्यविरोधि यत् ।
स्पन्दैकधर्मवान्वातो रसरूपतया जलम् ॥ २१ ॥
दृढोर्वी प्रकटं तेजः स्थितिमन्ति जगन्ति च ।
प्रतिबन्धाभ्यनुज्ञासु कालः कलनया स्थितः ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
पृथ्वी के अंकुररूप से बढ़ने में अन्य आकाशादि भूतो के रूप से वही अनुकूलता का आचरण
करता है, यह बतलाते हैं।
यदि आकाश सम्पूर्ण मूर्तं पदार्थो के अविरोधी छिद्र को न दे, तो निरवकाश होकर अंकुर बाहर न
निकले, इसलिए आकाशरूप से वह छिद्र देता हे । स्पन्दात्मक वायुरूप से वह उसका आकर्षण करता
है जिससे अंकुर बाहर निकलता हे । जलरूप होकर रसरूप से अंकुर को स्नेह युक्त करता है, दृढ़
पृथिवीरूप से अपनी दढता को देकर वह अंकुर के ऊपर अनुग्रह करता है, तेजरूप से अपना रूप देकर
अंकुर को प्रकट करता है, इसी प्रकार सकलजगतरूप से वह तत्-तत् कार्यो का स्थिति ओर अविद्या
द्वारा अनुग्राहक है हेमन्तादि कालरूप से भी वह जव आदि के अंकुरों के विरोधी दोषों की उत्पत्ति को
रोकने ओर फल के अंकुरों की उत्पत्ति के अनुकूल होने से उनका अनुग्राहक हे