Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 36, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
आयाति याति परितिष्ठति लीलयाऽतिस्वार्थानुपार्जयति धावति जन्मनाशैः ।
उन्मत्तवद्विहितभावनमाहितेहा मुग्धा कृतान्तविवशा जनता वराकी ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
पूर्वोक्त अर्थ का ही विस्तारपूर्वक उपसंहार करते हैं।
पूर्वजन्म के संकल्पों की वासनाओं के कारण उत्पन्न हुई विविध प्रकार की अभिलाषावाली अतएव
मुग्ध इसलिए काल से विवश करोड़ों ब्रह्माण्डरूप और उनके अन्तर्गत प्राणीरूप बेचारी जनता उन्मत्त
के समान इस लोक में जन्मों द्वारा आती है, परलोक में जाती हे, स्थावर आदि अनेक जन्मों द्वारा यहाँ
पर चारों ओर रहती है, भोगों की उत्कण्ठा से ऐहिक और पारलौकिक भोगों के उपायरूप धन, धर्म
आदि स्वार्थो का उपार्जन करती हे । इस प्रकार जन्म ओर नाशों से संसार में वह घूमती है