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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 36, Verses 9–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 36, verses 9–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 36 · श्लोक 9,10

संस्कृत श्लोक

तरङ्गादिमयी स्फारा नानाता सलिलार्णवे । तस्मान्न व्यतिरेकेण यथा भावविकारिणी ॥ ९ ॥ त्वत्तामत्तामयी स्फारा नानातेयं चिदर्णवे । चिन्मात्रव्यतिरेकेण तथा नैव प्रकाशते ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए उसमें भ्रान्ति से देखे गये भावों के विकार पृथक्‌ नहीं हैं, ऐसा कहते हैं । जैसे जलरूप सागर में तरंगादिमयी प्रचुर भिन्नता जल से अतिरिक्त विकारवाली नहीं है वैसे ही चिद्रूप सागर में त्वत्ता-अहन्तामयी प्रचुर भिन्नता चिन्मात्र से पृथक्‌ नहीं ही प्रकाशित होती है