Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 37, Verses 2–3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 37, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 37 · श्लोक 2, 3
संस्कृत श्लोक
स्वतः सर्वमिदं जातमन्योन्यं हेतुतां गतम् ।
अन्योन्यमभिनश्यत्तत्स्वत एव विलीयते ॥ २ ॥
स्वतोऽस्पन्दोऽपि तु स्पन्दो यथाऽगाधजलोदरे ।
तथैवेयमसत्सच्च चिदेव परिदृश्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
परस्पर एक-दूसरे के प्रति कारणता को प्राप्त हुआ यह सारा जगत अधिष्ठान
चैतन्य से ही उत्पन्न हुआ है, इसी प्रकार एक-दूसरे से परस्पर नष्ट होता हुआ यह अधिष्ठानचैतन्य में
ही लीन हो जाता हे । जैसे अगाध जल के मध्य में जल से अव्याप्त प्रदेश के होने के कारण जलका
स्पन्दन भी स्वतः अस्पन्दन ही हे वैसे ही असत् ओर सत् यानी जड जगत ओर जीवरूप से यह चिति ही
प्रतीत होती है