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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 15

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 38, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

तज्ज्ञस्य संकटे च मुदितैव केवलं ज्योत्स्नेव भुवनभावमलंकरोति येन चित्तादृते तु ज्ञः कुर्वन्न प्यकर्ता संपन्नो मनसोऽलेपकत्वान्नासौ पादपा ण्यादिविक्षेपस्य यत्नकृतस्यापि कर्मणः फलमनुभवति ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसलिए तत्त्वज्ञानी को संकटो में भी दुःख नही प्राप्त होता, प्रत्युत आनन्द ही रहता, ऐसा कहते है । इसलिए तत्त्वज्ञानी की चित्तवृत्ति संकटों मे भी आनन्दित ही रहती है। केवल चाँदनी की तरह भुवनता को अलंकृत करती है यानी जैसे चाँदनी भुवनता को अलंकृत करती है वैसे ही वह भी जीवभाव को अलंकृत करती है, क्योकि चित्त के बिना ज्ञानी कर्म करता हुआ भी अकर्ता है। वह मन के लेपक न होने के कारण हस्त-पाद आदि के विक्षेपरूप प्रयत्न से किये गये कर्म के फल का भी अनुभव नहीं करता