Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 38, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 38, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 38 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
यथा बालो मनसा नगरस्य निर्माणं निर्मृष्टं च
कुर्वंन्नगरनिर्माणं मनःकृतमकृतमिव लीलयानुभवति नोपादेयतयासुखदुःखमकृत्रिममिति पश्यति
नगरनिर्मथनं च मनःकृतं कृतमिति पश्यतीति दुःखमपि लीलयानुभवन्नपि न दुःखमिति पश्यति ।
एवमसौपरमार्थतःकुर्वन्नपि न लिप्यत एवेति ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कृत के भी अकृतत्व में दृष्टान्त कहते हैं।
जैसे बालक मन से नगर का निर्माण ओर निर्मित नगर का परिष्कार करता हुआ भी मन से किये गये
नगर निर्माण का लीला से अकृत की तरह अनुभव करता हे, उपादेयरूप से अनुभव नहीं करता । उनके
सुखदुःख का अनुभव करता हुआ भी यह दुःख नहीं है, यों जानता है, इसी प्रकार ज्ञानी करता हुआ
भी परमार्थतः लिप्त होता ही नहीं है