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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 19–20

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 39, verses 19–20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 19,20

संस्कृत श्लोक

यो व्युत्पन्नमनास्तस्य ज्ञातज्ञेयस्य धीमतः । मोक्षोपायगिरां पारं प्रयातस्य विवेकतः ॥ १९ ॥ न कश्चित्कस्यचिद्दोषो नास्ति विद्यात्मनि ह्यलम् । यावन्नोक्तं न विश्रान्तिं तावदेत्येष राघवः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

जो पुरुष जगत की जडता का परित्याग कर चिदेकरसता को देखने में समर्थ है, उस धीमान और ज्ञातज्ञेय (जिसने ज्ञातव्य तत्त्व जान लिया है) एवं विवेक से जो मोक्ष के उपायभूत वचनों का पार पा गया है, उसकी दृष्टि से किसी वस्तु का कुछ भी विरोध नहीं है, क्योकि विरुद्धरूप जगत विज्ञानरूप आत्मा में कहीं पर भी नहीं है, हम जब तक श्रीरामचन्द्रजी को भली-भाँति उपदेश नहीं देंगे, तब तक श्रीरामचन्द्रजी विश्रान्ति को प्राप्त नहीं ही होंगे इसलिए हमें इनको अवश्य उपदेश देना चाहिए, यह अर्थ है