Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 39, Verses 3–5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 39, verses 3–5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 39 · श्लोक 3-5
संस्कृत श्लोक
सत्त्वमसत्त्वं द्वित्वमेकत्वमनेकत्वमाद्यत्वमन्तत्वमिति ॥ ३ ॥
तच्च नान्यत् ।
यथा जलराशेर्जलाशय उल्लासप्रफुल्लासेन नानाकारतां दर्शयन्प्रकटतांगच्छति ॥ ४ ॥
तथा चिद्धनश्चित्तं चित्त्वाच्च सर्वाः शक्तीः
कर्ममयीर्वासनामयीर्मनोमयीश्चिनोति दर्शयति विभर्ति जनयति क्षिपयति चेति ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
जिनमें शक्ति नहीं है, उन्हीं में विरोध होता है, सर्वशक्तिशाली में तो कोई विरोध नहीं है, इस
अभिप्राय से कहते हैं।
ब्रह्म में सत्त्त-असत्त्व, द्वित्व-एकत्व, अनेकत्व, आद्यत्व और अन्तत्व सब कुछ है, किन्तु वे उससे
अतिरिक्त नहीं हैं । जैसे समुद्र का जलप्रवाह चन्द्रोदय आदि से हुए अपने उल्लास द्वारा विकसित
होकर तरंग ही नृत्य से अपने नानाकारता को दिखलाता हुआ प्रकट होता है, वैसे ही चिद्घन ब्रह्म
चित्तोपाधि जीवभाव का तथा उसके चिदाभासरूप से चित्त होने के कारण कर्म, वासनामयी, मनोमयी
सब शक्तियों का एक-एक करके संचय करता है और संचितों को फल द्वारा प्रकट करता है, उपभोग
द्वारा धारण करता है, पैदा करता हे, तिरोभाव से विनाश करता है