Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 4, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 4, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मनसीदं जगत्कृत्स्नं स्फारं स्फुरति चास्ति च ।
पुष्पगुच्छ इवामोदस्तत्स्थं तस्मादिवेतरत् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
और विचार करने पर जगत मन का धर्म ही है, इसलिए धर्मी मन के निवृत्त होने पर वह रह नहीं
सकता है, इस आशय से दृष्टान्तो को कहते हैं।
जैसे फूलों के गुच्छे मेँ सुगन्धि स्फुरित होती है और उसमें रहती भी है वैसे ही मन में यह विशाल
जगत स्फुरित होता है ओर रहता भी है, धर्मो मे धर्मी का भेद वास्तविक में नहीं है, यह द्योतन करने के
लिए अन्तिम श्लोक में इवकार हे