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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 42, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 42, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 42 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

क्रमेण पाकवशतः फलमेति यथान्यताम् । अवस्थयैव नाकृत्या जीवो मलवशात्तथा ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे फल पाकवश क्रमशः रूप, रस आदि गुणों के परिवर्तनसे ही अन्यरूपता को प्राप्त होता है, आकृति से (आम्रफल आदि जाति से) अन्यरूपता को प्राप्त नहीं होता वैसे ही क्षेत्रज्ञ भी अविद्यारूप मल के परिपाकवश विलक्षणता को प्राप्त होता हे । अपरिणामी चित्तस्वभाव से विलक्षणता को प्राप्त नहीं होता