Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 44, Verses 16–17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 44, verses 16–17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 44 · श्लोक 16,17
संस्कृत श्लोक
मनः संपद्यते लोलं कलनाकलनोन्मुखम् ।
कलयन्ती मनःशक्तिरादौ भावयति क्षणात् ॥ १६ ॥
आकाशभावनामच्छां शब्दबीजरसोन्मुखीम् ।
ततस्तां घनतां यातं घनस्पन्दक्रमान्मनः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
विविध कल्पना करने में संलग्न, ऐसा जो ऊपर कहा है, उसी को स्पष्ट करते हैं।
कल्पना कर रही मन की शक्ति पहले एक क्षण में शब्दतन्मात्ररूप श्रोत्रेन्द्रिय में उन्मुख निर्मल
आकाश भावना की भावना करती हे । पूर्वोक्त आकाश भावना को प्राप्त करके घनता को (वृद्धि को)
प्राप्त हुआ मन स्पन्दरूप घनता के क्रम से स्पर्श तन्मात्ररूप त्वगिन्द्रिय मे उन्मुख वायुरूप से स्पन्द की
भावना करता हे