Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 45, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 45, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 45 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
एतत्संकल्पमात्रात्म स्वप्नदृष्टपुरोपमम् ।
यत्रैव तत्र तच्छून्यं केवलं व्योम संस्थितम् ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
पर्व ओर उत्तर देश और काल से व्याप्ति तो दूर रही अपने आश्रयभूत (वर्तमान) देश और काल में
भी अध्यस्त द्वारा अधिष्ठान का स्पर्श नहीं होता । इसलिए ब्रह्माण्ड द्वारा प्रतिभासरूप देश ओर काल
की व्याप्ति नहीं हो सकती, इस आशय से कहते हैं।
जिस देश ओर काल में केवल संकल्पस्वरूप स्वप्न में देखे गये नगर के तुल्य यह जगत चित्तम भासित
होता हे, वहीं पर उसका अधिष्ठानरूप चैतन्य है । जगत से शून्य केवल आकाश ही स्थित हे