Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 31
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
इह सृष्टिषु पुष्टासु निकृष्टासु च राघव ।
परमान्नभसो जातास्तन्मात्रमलमालिका ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
परमार्थ दृष्टि से तो अज्ञ व तत्त्ववेत्ता सबकी दृष्टि से सब
सृष्टियाँ जैसे जड़ों द्वारा खीचे गये द्रवरूप भूमि के जल को धारण करनेवाली नाड्यो, त्वचा, पत्र, कोटिं
आदि सेमर से अतिरिक्त नहीं हे, वैसे ही ब्रह्म से अतिरिक्त नहीं है ॥ ३ ०॥ हे श्रीरामचन्द्रजी, स्थूलभूतों
से बनी हुई देहादि सृष्टियों में और सूक्ष्म भूतँ से बनी हुई इन्द्रियादि सृष्टियों मे परमाकाश से उत्पन्न
हुए भूतसूक्ष्मनामक पंचतन्मात्ररूप मायामलरूपी सूत्र की-स्फटिक, रुद्राक्ष से गुँथी हुई- माला के
समान सब पदार्थ हैं