Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 47, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 47, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 47 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
इदं चत्वारि संपीड्य पञ्चमं वर्धते यदा ।
तदा तज्जात एवैष कुरुते जागतीं क्रियाम् ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
अव उक्त आकाश आदि के एक-एक करके प्रथम आविर्भाव में युक्ति कहते है ।
इन चारों भूतो को अपने अंश को बढाने से तिरोहित-सा कर पाँचवा जो ही भूत जब बढता है, तब
उससे उत्पन्न हुए ही ये ब्रह्मा उसके अनन्तर होनेवाली जगत की सृष्टि क्रिया को करते हैं