Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 49, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 49, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 49 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
प्रवालचलहस्ताभिरलिनेत्राभिराश्रितम् ।
अप्सरोभिरिव स्वर्गं मञ्जरीभिरितस्ततः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पल्लव के समान चंचल सुन्दर हाथवाली ओर
भवर के समान नेत्रवाली अप्सराओं से स्वर्ग चारों ओर व्याप्त रहता है, वैसे ही कोपलरूपी चंचल
हाथवाली भँवररूपी सुन्दर नेत्रवाली मंजरियों से वह चारों ओर व्याप्त था