Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verses 11–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 56, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
सर्वेन्द्रियपदातीतो यदा कर्तेह विज्वरः ।
कुर्वाणः सर्वदा खेदं न कदाचन गच्छति ॥ ११ ॥
तेनेयं नियतिः प्रौढा भावाभावदशामयी ।
ईदृश्येव स्थिरा दीर्घा मिथ्योत्थापि च दृश्यते ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
भले ही नियति से होनेवाली सृष्टि में परमात्मा की सन्निधिमात्र से कर्तृता हो पर यह मेरे सृष्टि
करने योग्य वस्तु है, इस अभिमान से उसमें उसका खेद युक्त नहीं है ऐसा कहते हैं।
सम्पूर्ण इन्द्रियों से रहित ओर आयासशून्य परमात्मा यदि इसका कर्ता हो, तो सदा इसकी रचना
करता हुआ भी कभी खेद को प्राप्त नहीं होता इसी से भाव ओर अभाव अवस्थावाली यह प्रोढ
नियतिशक्ति मिथ्या उदित हुई भी इस प्रकार की स्थिर ओर दीर्घ दिखाई देती है