Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 56, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
स्थिराश्चेज्जगतां भावास्तत्त्वादास्था न शोभते ।
कथमन्योन्यसंश्लेषो जडचेतनयोः किल ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत के पदार्थ यदि स्थिर है, तो स्थिर होने के कारण ही यानी त्याग और उपादान के लिए अयोग्य
होने के कारण ही उनमें आस्था करना शोभा नहीं देता। असंग शुद्ध चेतन का जड़ के साथ सम्बन्ध भी
नहीं हो सकता, इसलिए भी उन पर आस्था करना अनुचित है, इस आशय से कहते हैं।
जड़ और चेतन का अन्योन्य सम्बन्ध कैसे हो सकता है ?