Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verses 25–27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 56, verses 25–27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 25-27
संस्कृत श्लोक
अन्तरास्थां परित्यज्य भावश्रीभावनामयीम् ।
योऽसि सोऽसि जगत्यस्मिँल्लीलया विहरानघ ॥ २५ ॥
अकर्तृत्वपदं पीत्वा पीत्वेच्छामपि कुर्वतः ।
सर्वभावान्तरस्थस्य सर्वातीतस्य चात्मनः ॥ २६ ॥
इयं संनिधिमात्रेण नियतिः परिजृम्भते ।
दीपसंनिधिमात्रेण निरिच्छैव प्रकाशते ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
स्त्री आदि
वस्तुओं से सौन्दर्य की चिन्तनमयी आस्था का अपने अन्दर अच्छी तरह परित्याग कर, अकर्तृत्वपद
ओर उसकी इच्छा को निगलकर जो आप परिशिष्ट हैं वही आप हैं, हे अनघ, इस प्रकार के आप
इस जगत में लीला से विहार कीजिए । व्यवहार मेँ उदासीनता से कर्तारूप, सब पदार्थो के अन्दर
स्थित ओर सबसे अतीत आत्मरूप आपके सन्निधानमात्र से इच्छारहित यह नियति व्यवहार के
आकार से प्रतीत होती है जैसे कि दीपक के सन्निधानमात्र से इच्छारहित प्रभा प्रकाशित होती
हे