Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 56, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 56, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 56 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
न कदाचिदिदं शान्तं जगद्राम न च क्षयि ।
अजस्रं दृश्यमानत्वाद्भावित्वाच्च पुनःपुनः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
उसकी अनिर्वचनीयता को ही युक्ति से दिखलाते है।
यह जगत न तो कभी अत्यन्त अभावरूप शून्यस्वभाव था ओर न कभी प्रध्वंस प्रयुक्त शून्यस्वभाव
था, कारण किं शून्य वस्तु का दर्शन नहीं होता, किन्तु जगत सदा प्रवाहरूप से दिखाई देता है एवं
ध्वस्त वस्तु की उत्पत्ति में विरोध होता है किन्तु जगत पुनः पुनः उत्पन्न होता है, इसलिए यह जगत
अत्यन्त अभाव एवं प्रध्वंस अभावरूप कभी नहीं था