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Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verses 2–3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verses 2–3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 2,3

संस्कृत श्लोक

सर्वेश्वरः सर्वगश्च चिन्मात्रममलं पदम् । स्थानं भुवि वपुर्देवः सर्वभूतान्तरस्थितः ॥ २ ॥ हदयंगमतां प्राप्तमिदानीं ब्रह्म मे विभो । त्वदुक्तिभिर्यथाम्भोदधाराभिर्भूभृदव्यथः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

सबके नियन्ता, सर्वव्यापक, चिन्मात्र, निर्मलपद, जैसे पृथिवी में जरायुज, उद्भिज आदि चार प्रकार के प्राणी शरीर रहते हैं वैसे ही सब भूत जिसमें निवास करते हैं और स्वयं जो सब भूतो का अन्तर्यामी है, हे प्रभो, ऐसा ब्रह्म इस समय मेरे हृदयंगम हो गया है । जैसे मेघों की मुसलधार वृष्टि से पर्वत ग्रीष्म के सन्ताप से रहित हो जाता हे वैसे ही आपकी उक्तियों से मैं सन्तापरहित हो गया हूँ