Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
यद्यदालोक्यते किंचित्कश्चिद्यत्तन्न विद्यते ।
ईप्सितानीप्सितादन्यन्न तत्र यतते जनः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
देखी, आत्मा के प्रति लगन नहीं देखी, ऐसा कहते हैं।
यहाँ पर जो कुछ दिखाई देता है, वह इष्ट ओर अनिष्ट से अतिरिक्त नहीं है। उससे अतिरिक्त जो
अविषय आत्मतत्त्व है उसके लिए कोई भी पुरुष प्रयत्न नहीं करता; किन्तु इष्ट ओर अनिष्ट के लिए ही
लोग प्रयत्न करते हैं