Yoga Vasistha — Sthiti Prakarana (Existence), Sarga 57, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के स्थिति प्रकरण, सर्ग 57, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
स्थिति प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
ये महामतयः सन्तः शूराश्चेन्द्रियशत्रुषु ।
जन्मज्वरविनाशाय त उपास्या महाधियः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि कोई शंका करे कि संसार में उत्तम राज्यादि पद प्राप्त करने पर भी शान्ति दिखाई देती है फिर
आत्मदर्शन का क्या प्रयोजन है ? इस पर नहीं, ऐसा कहते हैं।
प्राणी चाहे भुवन में राज्य करे, चाहे इन्द्रपद प्राप्ति द्वारा मेघ में प्रवेश करे अथवा वरुणपद प्राप्ति
द्वारा जल में प्रवेश करे, पर आत्मलाभ के बिना उसे शान्ति नहीं मिल सकती ॥ ३ ४॥
तब विश्रान्ति चाहनेवाले पुरुष को किनकी उपासना करना चाहिये ? ऐसा प्रश्न होने पर उनके
उपासनीय पुरुषों को कहते हैं।
जो महाज्ञानी सज्जन इन्द्रियरूपी शत्रुओं का दमन करने में शूर-वीर हैं, जन्मरूप ज्वर के नाश के
लिए उन्ही महामतियों की उपासना करनी चाहिये